रायगढ़ कथक घराना, चक्रधर समारोह और डॉ. बलदेव

रायगढ़ कथक की परंपरा कलाकारों, साधकों, अध्येताओं और दस्तावेजकारों के सामूहिक योगदान से विकसित हुई।
महाराजा चक्रधर सिंह ने इसे संरक्षण ही नहीं, बल्कि साधना, संवाद और प्रयोगों से विशिष्ट दिशा दी। गम्मत के कलाकारों से लेकर देशभर के कथक गुरुओं तक, उनके दरबार में कला के विविध स्रोत जुड़े। डॉ. बलदेव जैसे गंभीर अध्येताओं ने इस समृद्ध परंपरा की बिखरी स्मृतियों को शब्द देकर उसे आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित और जीवंत बनाया।

दुर्भाग्य यह है कि बाद की पीढ़ियाँ अक्सर उस सामग्री और ग्रंथों का उपयोग तो करती हैं, लेकिन उनके मूल स्रोत और उन्हें सामने लाने वाले लेखक का नामोल्लेख नहीं करतीं। रायगढ़ कथक के संदर्भ में डॉ. बलदेव का प्रसंग इसी विडंबना की ओर ध्यान खींचता है।

रायगढ़ की कथक परंपरा का विकास किसी एक व्यक्ति की देन नहीं था। इस यात्रा में महाराजा चक्रधर सिंह का योगदान सबसे पहले सामने आता है। वे केवल कला-प्रेमी राजा नहीं थे, बल्कि संगीत और नृत्य के गंभीर अध्येता, साधक और प्रयोगशील स्वभाव के व्यक्ति थे।

गाँव-देहात की गम्मत में सक्रिय बालक कार्तिक और बर्मन जैसे कलाकारों को उन्होंने अपने कथक नृत्य की शास्त्रीय शैली से जोड़ा। उनके दरबार में देश के विभिन्न हिस्सों से बड़े कलाकार और कथक के उस्ताद आते रहे। उनके साथ संवाद, रियाज़ और प्रयोगों ने रायगढ़ में कथक को एक अलग दिशा दी।

इस वातावरण में कथक की पारंपरिक शैलियों का प्रभाव तो था ही, लेकिन उसके साथ रायगढ़ की अपनी रचनात्मकता भी विकसित हुई। यही वह आधार था, जिसे आगे चलकर ‘रायगढ़ कथक’ की विशिष्ट पहचान के रूप में देखा गया।

डॉ. बलदेव ने स्वयं अपने लेख की पृष्ठभूमि बताते हुए लिखा था कि देश के अनेक प्रसिद्ध नर्तकों की प्रस्तुतियाँ देखने-परखने, संगीत और नृत्य संबंधी साहित्य पढ़ने तथा नृत्यविदों से संवाद करने के साथ-साथ रायगढ़ के नर्तकों को देखने पर उन्हें उनकी शैली में एक अलग विशिष्टता और नव्यता दिखाई दी। प्रसिद्ध कला-समीक्षक स्व. अनिल कुमार की प्रेरणा से उन्होंने इसी विशिष्टता और पार्थक्य को आधार बनाकर लेख लिखने का निर्णय लिया।

इस संदर्भ में वर्ष 1979 का एक पत्र विशेष महत्त्व रखता है। ‘रंग-संधान’ के संपादक अनिल कुमार द्वारा डॉ. बलदेव को भेजे गए इस पत्र में रचना का विषय स्पष्ट रूप से “मध्यप्रदेश में कथक : रायगढ़ घराना” दर्ज है। पत्र में रचना के प्रकाशन की सूचना भी मिलती है। इससे कम-से-कम इतना संकेत अवश्य मिलता है कि 1979 तक डॉ. बलदेव के लेखन में रायगढ़ की कथक परंपरा को ‘रायगढ़ घराना’ के रूप में देखने की अवधारणा स्पष्ट रूप ले चुकी थी।

इसके बाद सितंबर 1980 में ‘संगीत’ पत्रिका में उनका मूल लेख ‘कथक : रायगढ़ घराना’ प्रकाशित हुआ। उनके अनुसार, यह लेख चक्रधर कला परिषद, रायगढ़ में भी पढ़ा गया। सेठ महावीर अग्रवाल और किशन डालमिया के संयोजन में आयोजित उस अवसर पर लेख को समर्थन मिला और बाद में भोपाल में आयोजित ‘कथक शिविर’ में भी उसका वाचन हुआ।

इन दस्तावेजों और घटनाक्रम से यह समझने में मदद मिलती है कि डॉ. बलदेव रायगढ़ की कथक परंपरा को केवल देखने वाले व्यक्ति नहीं थे। वे उसकी विशिष्टता को समझने, उसका अध्ययन करने और उसे वैचारिक पहचान देने का प्रयास कर रहे थे। उन्होंने घराना बनाया नहीं था, बल्कि विकसित हो चुकी परंपरा की विशिष्टताओं को पहचानकर उसे नाम और विचार का आधार देने की कोशिश की थी।

‘रायगढ़ में कथक’ और लेखकत्व का विवाद

डॉ. बलदेव के मूल लेख के प्रकाशन के बाद राजकमल प्रकाशन से ‘रायगढ़ में कथक’ नाम से प्रकाशित पुस्तक को लेकर लेखकत्व का विवाद सामने आया। 6–12 फरवरी 1983 के ‘दिनमान’ में प्रकाशित सतीश जायसवाल का लेख ‘रायगढ़ में कथक : असलियत क्या है?’ इस विवाद का एक महत्त्वपूर्ण समकालीन दस्तावेज है।

जायसवाल के लेख में उपलब्ध विवरणों से यह संकेत मिलता है कि पुस्तक की मूल रचना डॉ. बलदेव द्वारा लिखी गई थी और उसका मूल शीर्षक ‘कथक : रायगढ़ घराना’ था। उनके अनुसार, बाद में इसे विस्तार देकर पुस्तक का रूप दिया गया।
विवाद से जुड़े विवरणों में यह भी सामने आता है कि कथक के तकनीकी पक्ष—बोल, परन, बंदिशों और नृत्य की बारीकियों—को समझने और संकलित करने के लिए डॉ. बलदेव ने कथक नर्तक कार्तिक राम तथा अन्य वरिष्ठ कथक कलाकारों से संवाद और सहयोग लिया था।

इसी क्रम में कार्तिक राम और डॉ. बलदेव के बीच पुस्तक में क्रमशः लेखक और सहयोगी लेखक के रूप में नाम दिए जाने की सहमति बनी होने की बात भी सामने आती है।

लेकिन जब पुस्तक प्रकाशित हुई, तो उसमें डॉ. बलदेव का नाम सहयोगी लेखक के रूप में नहीं था और न ही उनकी तैयार की गई भूमिका प्रकाशित हुई। इसके विपरीत, कार्तिक राम की भूमिका पुस्तक में शामिल की गई।

डॉ. बलदेव का पक्ष था कि उनके शोध, संकलन, विश्लेषण और लेखन से जुड़े योगदान को वह स्थान नहीं मिला, जिसकी अपेक्षा उन्होंने की थी। यह प्रसंग इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि कार्तिक राम अपने समय के अत्यंत महत्त्वपूर्ण और सिद्धहस्त कथक कलाकार थे, जबकि पुस्तक के लेखकीय स्वरूप और सामग्री के संकलन-लेखन में डॉ. बलदेव की भूमिका एक अध्येता और लेखक की थी।

इसलिए विवाद केवल नाम के छूट जाने का नहीं, बल्कि शोध, मौखिक परंपरा और कलात्मक अनुभव को शब्दबद्ध करने वाले योगदान की उचित पहचान का भी था।

यहीं से विवाद केवल लेखक के नाम तक सीमित नहीं रहा। यह रचनात्मक श्रेय, बौद्धिक योगदान और साहित्यिक नैतिकता का प्रश्न बन गया।

इस प्रश्न को स्थानीय स्तर पर उठाने वालों में डॉ. देवधर महंत का नाम उल्लेखनीय है। जांजगीर से प्रकाशित साप्ताहिक ‘जांजगीरज्योति’ में उनका लेख ‘रायगढ़ में कथक : कौन असली लेखक?’ प्रकाशित हुआ। इससे पहले ‘नवभारत’ में भी इस विवाद की चर्चा हो चुकी थी। ‘बिलासपुर टाइम्स’ में भोपाल से प्रकाशित पत्रिका ‘कलावार्ता’ में छपी विवादित टिप्पणी के जवाब में डॉ. बलदेव के आलेखों की धारावाहिक श्रृंखला ‘ये बाघनख किसके हैं’, ‘डूबा वंश कबीर का’ शीर्षक से 1, 2, 3, 4 और 5 क्रम में प्रकाशित हुई थी।

उस समय बिलासपुर के धोंधाबाबा मंदिर में साहित्यकारों की नियमित बैठकें होती थीं। द्वारका प्रसाद तिवारी ‘विप्र’ के नेतृत्व में होने वाली इन बैठकों में श्यामलाल चतुर्वेदी, पालेश्वर प्रसाद शर्मा, बाबूलाल सीरिया ‘दुर्लभ’, गेंद राम सागर, लक्ष्मीनारायण मिश्र सहित अनेक साहित्यकार उपस्थित रहते थे। इन्हीं बैठकों में इस मामले को व्यापक स्तर पर उठाने की आवश्यकता पर चर्चा हुई। उपस्थित साहित्यकारों ने इस विषय को गंभीर माना।

इसी क्रम में मामला सतीश जायसवाल तक पहुँचा और उन्होंने इसे ‘दिनमान’ में उठाया। इस लेख के बाद रायगढ़ कथक से जुड़ा विवाद स्थानीय दायरे से निकलकर व्यापक सांस्कृतिक और साहित्यिक चर्चा का हिस्सा बन गया। इसके साथ कुछ बुनियादी प्रश्न भी सामने आए—डॉ. बलदेव कौन हैं? उन्होंने रायगढ़ कथक के लिए क्या किया? ‘रायगढ़ घराना’ की अवधारणा का आधार क्या है? और इस परंपरा को इतिहास में किस तरह दर्ज किया जाना चाहिए?

‘पूर्वग्रह’ का प्रसंग

डॉ. बलदेव के लेखन को लेकर एक अन्य विवाद भी सामने आया। उनके अनुसार, मध्यप्रदेश कला परिषद द्वारा भोपाल में आयोजित ‘कथक प्रसंग’ में उनके लेख के वाचन को लेकर तत्कालीन शासकीय महाविद्यालय, रायगढ़ के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रोफेसर प्रमोद वर्मा के साथ एक समझ बनी थी।

उनके अनुसार, कार्यक्रम में ‘कथक : रायगढ़ घराना’ का वाचन प्रमोद वर्मा करेंगे और उससे जुड़े प्रश्नों के उत्तर वे स्वयं देंगे। डॉ. बलदेव का आरोप था कि बाद में प्रमोद वर्मा अकेले भोपाल गए और वहाँ लेख का पाठ किया। उनका यह भी कहना था कि बाद में लेख में फेरबदल कर उसे मध्यप्रदेश कला परिषद की साहित्यिक पत्रिका ‘पूर्वग्रह-34’ में प्रमोद वर्मा के नाम से प्रकाशित कराया गया।

यह प्रसंग भी लेखकत्व और बौद्धिक श्रेय के उसी बड़े प्रश्न से जुड़ा है। हालाँकि ऐसे आरोपों की अंतिम पुष्टि के लिए मूल पांडुलिपि, पत्राचार और प्रकाशन संबंधी अभिलेखों का तुलनात्मक अध्ययन आवश्यक है। इसलिए इसे उपलब्ध समकालीन विवरण और डॉ. बलदेव के कथन के रूप में ही देखा जाना अधिक उचित होगा।

‘रायगढ़ घराना’—एक अलग बहस

लेखकत्व के विवाद के साथ ही एक दूसरा सवाल भी सामने आया—रायगढ़ की कथक परंपरा को स्वतंत्र ‘घराना’ कहा जाए या नहीं?

‘दिनमान’ में प्रकाशित सामग्री के अनुसार, मुंबई की प्रसिद्ध पखावज वादिका डॉ. अबन मिस्त्री ने रायगढ़ को कथक का स्वतंत्र घराना मानने पर सवाल उठाया था। उनका तर्क था कि रायगढ़ की नृत्य-संगीत परंपरा राजपरिवार के सांस्कृतिक परिवेश में अधिक केंद्रित रही और यहाँ वह सतत गुरु-शिष्य परंपरा विकसित नहीं हुई, जो किसी घराने की पहचान के लिए आवश्यक मानी जाती है।

यह आपत्ति अपने आप में एक महत्त्वपूर्ण अकादमिक प्रश्न उठाती है। आखिर ‘घराना’ किसे कहा जाए? किसी स्थान पर विकसित हुई अलग शैली पर्याप्त है या उसके साथ गुरु-शिष्य परंपरा, विशिष्ट रचनात्मकता, निरंतरता और व्यापक प्रसार भी ज़रूरी है?

भारतीय शास्त्रीय कलाओं में घराना केवल भौगोलिक नाम नहीं होता। वह वर्षों की साधना, शैलीगत पहचान और पीढ़ियों के बीच ज्ञान के हस्तांतरण से बनता है। इसलिए रायगढ़ को घराना मानने या न मानने की बहस केवल शब्द की बहस नहीं है। यह इस बात से भी जुड़ी है कि हम कला-परंपराओं का इतिहास किस कसौटी पर लिखते हैं।

लेकिन इस बहस के बीच एक तथ्य को अलग से देखा जाना चाहिए—1980 के दशक की शुरुआत तक रायगढ़ की कथक परंपरा की विशिष्टता पर गंभीर चर्चा शुरू हो चुकी थी और उस चर्चा को व्यवस्थित रूप से सामने लाने वालों में डॉ. बलदेव का लेखन प्रमुख था।

डॉ. राजू पांडेय ने लिखा— “राजा चक्रधर सिंह और रायगढ़ के कथक घराने पर उनका शोध चमत्कृत कर जाता है। रायगढ़ की साहित्यिक-सांस्कृतिक विरासत को समझने के लिए केवल एक ही रास्ता है और वह डॉ. बलदेव के अन्वेषणपरक लेखों से होकर गुजरता है।”

आलोचक नंदकिशोर तिवारी ने भी लिखा—“रायगढ़ के सांगीतिक महत्त्व को प्रकाश में लाने का भगीरथ प्रयास डॉ. बलदेव ने किया। उन्होंने रायगढ़ के कथक के महत्त्व को दर्शाते हुए उसकी सम्यक् विवेचना की।”

इन टिप्पणियों को केवल प्रशंसा के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। वे इस बात की ओर भी संकेत करती हैं कि डॉ. बलदेव ने रायगढ़ की मौखिक और सांगीतिक स्मृतियों को अध्ययन और दस्तावेजीकरण का विषय बनाया।

उनकी पुस्तक ‘रायगढ़ का सांस्कृतिक वैभव’ इसी दृष्टि का महत्त्वपूर्ण दस्तावेज है। रायगढ़ की संगीत-परंपरा, कथक और उसके सांस्कृतिक परिवेश को समझने में उनका लेखन आज भी संदर्भ सामग्री के रूप में उपयोग किया जा रहा है।

चक्रधर समारोह

फिर आता है चक्रधर समारोह का प्रसंग।
रायगढ़ में आयोजित चक्रधर समारोह ने रायगढ़ कथक घराने के साथ-साथ दूसरे घरानों और अन्य कलाओं को भी एक व्यापक सार्वजनिक मंच दिया। 1984 में गणेश मेला, चक्रधर समारोह का पहला आयोजन हुआ। इसके पीछे पं. मुकुटधर पांडेय और किशोरी मोहन त्रिपाठी का संरक्षण तथा तत्कालीन सांसद केयूर भूषण की अध्यक्षता जैसी महत्त्वपूर्ण भूमिकाएँ थीं।

डॉ. बलदेव, ठाकुर वेदमणी सिंह, जगदीश मेहर, मनहरण सिंह ठाकुर, गणेश कछवाहा, रजनीकांत मेहता, गुरुदेव चौबे कश्यप, उर्मिला देवी, पं. बर्मन लाल, लाला फूलचंद श्रीवास्तव, बासंती वैष्णव और सुनील वैष्णव सहित अनेक लोगों ने इस आरंभिक प्रयास को आकार देने में अपना योगदान दिया। यह वह दौर था, जब समारोह केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि रायगढ़ की सांस्कृतिक स्मृति को सार्वजनिक मंच देने का प्रयास था।

आगे चलकर समारोह ने रायगढ़ की संगीत और नृत्य-संपदा को देश के व्यापक सांस्कृतिक परिदृश्य से जोड़ा। देश के विभिन्न हिस्सों से कलाकार यहाँ आने लगे। कथक, शास्त्रीय संगीत और अन्य कलाओं की प्रस्तुतियों ने रायगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को लगातार विस्तार दिया।

रायगढ़ कथक की यात्रा किसी एक व्यक्ति की कहानी नहीं है
राजा चक्रधर सिंह ने संरक्षण, साधना और प्रयोग का वातावरण तैयार किया। कार्तिक राम, कल्याण दास, फिरतू महाराज, बर्मन लाल, रामलाल, बासंती वैष्णव और सुनील वैष्णव जैसे कलाकारों ने उसे मंच पर जीवित रखा। चक्रधर समारोह ने उसे व्यापक सार्वजनिक मंच दिया और डॉ. बलदेव जैसे अध्येताओं ने उसकी स्मृतियों, विशेषताओं तथा इतिहास को शब्दों में दर्ज करने का प्रयास किया।

इन सभी भूमिकाओं को एक-दूसरे का विकल्प मानना उचित नहीं होगा। कलाकार और लेखक का काम अलग होता है, लेकिन सांस्कृतिक विरासत को बचाए रखने में दोनों की ज़रूरत पड़ती है।

डॉ. बलदेव का प्रसंग इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि उनके योगदान पर बात करते समय भावुक प्रशंसा के बजाय प्रमाणों की ओर लौटना चाहिए। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, 1979 में ही उनके लेखन में ‘रायगढ़ घराना’ की अवधारणा स्पष्ट रूप से दिखाई देती है और 1980 में ‘कथक : रायगढ़ घराना’ प्रकाशित हुआ। इसके बाद उनके लेखन और उससे जुड़े विवादों ने रायगढ़ कथक को व्यापक सांस्कृतिक चर्चा का हिस्सा बनाया।

रायगढ़ के घुँघरुओं की गूँज आज बहुत दूर तक सुनाई देती है। उसमें चक्रधर सिंह की कल्पना है, कलाकारों का रियाज़ है, गुरुओं की साधना है, चक्रधर समारोह का सार्वजनिक विस्तार है और उन अध्येताओं की बेचैनी भी, जिन्होंने इस कला को केवल मंच पर नहीं देखा, बल्कि उसके पीछे छिपी स्मृतियों को भी पकड़ने की कोशिश की।

डॉ. बलदेव उन्हीं अध्येताओं में एक महत्त्वपूर्ण नाम हैं। उन्होंने रायगढ़ कथक की विशिष्टता को पहचानने, उसके इतिहास और सांस्कृतिक संदर्भों को समझने तथा उन्हें लेखन के माध्यम से सुरक्षित करने का प्रयास किया। जब किसी कला की अगली पीढ़ियाँ उसका इतिहास पढ़ें, तो उन्हें केवल मंच के कलाकार ही नहीं, बल्कि वे लोग भी याद आने चाहिए, जिन्होंने उस कला को शब्दों में दर्ज कर इतिहास का रूप दिया। डॉ. बलदेव के प्रति यही सबसे सार्थक स्मरणांजलि होगी।

(बसंत राघव का लेख)

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